Try Try again or Maybe NotTry Try again or Maybe Not

कोशिश करो, फिर कोशिश करो  या शायद नहीं

Try Try Again or Maybe Not

‘‘कोशिश करो, फिर कोशिश करो’’– यह एक ऐसा मंत्र है जिसे हमने अपनी परवरिश के हर पड़ाव पर सुना है, स्कूल की किताबों से लेकर प्रेरक भाषणों तक। हमें सिखाया जाता है कि असफलता सिर्फ सफलता की सीढ़ी है, हमें कभी हार नहीं माननी चाहिए और दृढ़ता ही हर मुश्किल को पार करने की कुंजी है।  निश्चित रूप से यह एक शक्तिशाली विचार है जिसने अनगिनत लोगों को अपनी राह में आने वाली बाधाओं को तोड़ने और अपने सपनों को साकार करने के लिए प्रेरित किया है। यह विश्वास हमें प्रतिकूल परिस्थितियों में भी लगे रहने की शक्ति देता है, यह हमें याद दिलाता है कि सबसे कठिन समय में भी आशा की एक किरण बाकी रहती है। लेकिन क्या यह मंत्र हर स्थिति में, हर परिदृश्य में लागू होता है? गलतियों से सीखने की जरूरत से ज्यादा महत्व दिया जताा है। क्या कभी-कभी ऐसा भी होता है जब यह बेहतर होता है कि हम यह समझें कि कब रुकना है, कब दिशा बदलनी है, या कब किसी और रास्ते को अपनाना है? यह एक ऐसा सवाल है जिस पर गहराई से विचार करने की आवश्यकता है, क्योंकि लगातार कोशिश करने और अपनी ऊर्जा को सही जगह या सही दिशा पर लगाने के बीच एक महीन रेखा होती है। इस संतुलन को समझना ही जीवन में बुद्धिमत्ता और दक्षता की कुंजी है।

सफलता और असफलता

एक और आम गलत धारणा है कि आपको अपनी गलतियों से सीखने की ज़रूरत है। दरअसल आप गलतियों से क्या सीखते हैं ? आप गलतियों से यही सीखते हैं कि दोबारा क्या नहीं करना है, इससे आपको यह पता नहीं चलता कि अगली बार आपको क्या करना चाहिए।

परन्तु इसके विपरीत सफलता आपको असली गोला-बारूद देती है। जब कोई चीज़ सफल होती है, तो आप जानते हैं कि क्या कारगर रहा और आप इसे अगली बार दोबारा कर सकते हैं और अगली बार आप शायद इसे और अच्छी तरह करेंगे।

असफलता सफलता की अनिवार्य शर्त नहीं है। हार्वर्ड बिज़नेस स्कूल के एक अध्ययन में पाया गया कि पहले से सफल उद्यमियों के दोबारा सफल होने की कहीं ज़्यादा संभावना रहती है (उनकी भावी कंपनियों की सफलता दर 34 प्रतिशत है)। लेकिन जिन उद्यमियों की कंपनियाँ पहली बार में असफल रहीं, उनकी सफलता की दर उतनी ही थी, जितनी कि पहली बार कंपनी शुरू करने वालों की थीः सिर्फ़ 23 प्रतिशत। अर्थात जो लोग पहले असफल हो चुके हैं, उन्हें भी उतनी ही सफलता मिलती है, जितनी कभी कोशिश न करने वालों को मिलती है। दरअसल सफलता का अनुभव ही मायने रखता है। प्रकृति इसी तरह काम करती है। विकास पिछली असफलताओं पर केंद्रित नहीं होता। यह हमेशा कारगर चीज़ों की बुनियाद पर निर्माण करता है।

दृढ़ता का महत्वः- क्यों ‘‘कोशिश करो’’ अक्सर काम करता है

इसमें कोई संदेह नहीं कि दृढ़ता और लचीलापन सफलता के लिए सबसे महत्वपूर्ण गुण हैं। इतिहास ऐसे उदाहरणों से भरा पड़ा है जहाँ महान आविष्कारकों, कलाकारों और नेताओं ने बार-बार असफलता का सामना किया, लेकिन फिर भी उन्होंने हार नहीं मानी। थॉमस एडिसन ने बल्ब बनाने के लिए हज़ारों असफल प्रयास किए, लेकिन उन्होंने कभी इसे असफलता नहीं माना। उनका प्रसिद्ध उद्धरण है, ‘‘मैंने असफलता नहीं देखी है। मैंने बस 10,000 ऐसे तरीके खोजे हैं जो काम नहीं करते।’’ यह कथन उनके अटूट विश्वास और लक्ष्य के प्रति समर्पण को दर्शाता है। इसी तरह, जे.के. रोलिंग की ‘‘हैरी पॉटर’’ पांडुलिपि को कई प्रकाशकों ने अस्वीकार कर दिया था, इससे पहले कि वह दुनिया की सबसे सफल पुस्तक श्रृंखलाओं में से एक बनी और एक सांस्कृतिक घटना बन गई।

खेल जगत में, माइकल जॉर्डन, जिन्हें अक्सर इतिहास का सबसे महान बास्केटबॉल खिलाड़ी माना जाता है, ने अपने करियर में हजारों शॉट्स मिस किए और कई खेल हारे। उन्होंने खुद कहा है, ‘‘मैं अपने जीवन में बार-बार असफल हुआ हूँ। और यही कारण है कि मैं सफल हुआ हूँ।’’ ये कहानियाँ हमें प्रेरणा देती हैं कि विपरीत परिस्थितियों में भी डटे रहना चाहिए, कि हर ठोकर हमें कुछ सिखाती है, और कि हार का सामना करने के बाद उठ खड़े होने की क्षमता ही हमें आगे बढ़ाती है। वे हमें सिखाती हैं कि सफलता अक्सर उन लोगों को मिलती है जो बाधाओं के बावजूद आगे बढ़ते रहते हैं, जो अपनी गलतियों से सीखते हैं और अपनी रणनीति में सुधार करते हैं। यह दृढ़ता ही है जो हमें अपने कम्फर्ट जोन से बाहर निकलने और असंभव लगने वाले लक्ष्यों को प्राप्त करने की ओर धकेलती है।

जब ‘‘कोशिश करो’’ बन जाता है ‘‘मूर्खतापूर्ण हठ’’

हालाँकि, यहीं पर हमें सवाल पूछना पड़ता हैः क्या ‘‘कोशिश करो, फिर कोशिश करो’’ की यह विचारधारा हमें कभी-कभी एक ऐसे रास्ते पर धकेल देती है जो अंततः फलदायक नहीं है? क्या यह हमें उन संकेतों को अनदेखा करने के लिए प्रोत्साहित करती है जो बताते हैं कि हमारा प्रयास व्यर्थ हो रहा है? कुछ स्थितियों में, निरन्तरता और हठ के बीच का अन्तर महत्वपूर्ण हो जाता है। यदि हम एक ही रणनीति का बार-बार उपयोग कर रहे हैं और लगातार एक ही परिणाम (असफलता) प्राप्त कर रहे हैं, तो क्या यह मूर्खता नहीं है कि हम उसी रास्ते पर चलते रहें और एक अलग परिणाम की उम्मीद करें? महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन ने कथित तौर पर कहा था, ‘‘पागलपन एक ही काम को बार-बार करना और एक अलग परिणाम की उम्मीद करना है।’’ यह उद्धरण हमें सोचने पर मजबूर करता है कि क्या हम अपनी ऊर्जा को सही जगह पर लगा रहे हैं।

एक बिन्दु पर, हमें यह मूल्यांकन करना होगा कि क्या हमारा प्रयास वास्तविक प्रगति की ओर ले जा रहा है, या हम केवल ‘‘अच्छे पैसे को बुरे पैसे के पीछे फेंक रहे हैं’’ (जीतवूपदह हववक उवदमल ंजिमत इंक) दृ यानी, हम पहले से ही असफल निवेश में और अधिक संसाधन लगा रहे हैं। उदाहरण के लिए, यदि कोई व्यक्ति किसी व्यवसायिक उद्यम में लगातार नुकसान उठा रहा है, और बाजार की स्थिति, उत्पादों की गुणवत्ता, या प्रतिस्पर्धात्मकता में कोई महत्वपूर्ण बदलाव नहीं हो रहा है, तो क्या उसे अनंत काल तक उस व्यवसाय में पैसा लगाना जारी रखना चाहिए? क्या यह बेहतर नहीं होगा कि वह नुकसान को स्वीकार करे, अपनी गलतियों से सीखे, और अपनी ऊर्जा और पूंजी को किसी नए, अधिक व्यवहार्य विचार में निवेश करे?

इसी तरह, एक छात्र जो किसी विशेष विषय में बार-बार असफल हो रहा है, बावजूद इसके कि वह अपनी पूरी कोशिश कर रहा है और अपने अध्ययन के घंटों को बढ़ा रहा है, तो क्या उसे अपनी पढ़ाई के तरीके को बदलने, किसी और विषय में अपनी प्रतिभा खोजने, या यहां तक कि अपनी शैक्षणिक दिशा बदलने पर विचार करना चाहिए? कभी-कभी, समस्या हमारी कोशिश में नहीं होती, बल्कि हमारे दृष्टिकोण में, हमारे रास्ते में, या यहां तक कि हमारे चुने हुए लक्ष्य में होती है। अपनी गलतियों को स्वीकार करने और अपनी रणनीति में बदलाव करने की क्षमता ही हमें आगे बढ़ने में मदद करती है, न कि केवल उसी राह पर अंधाधुंध चलते रहने में।

कब ‘‘छोड़ना’’ एक बुद्धिमान निर्णय है

यह विचार करने का समय आता है कि कब छोड़ना (हपअपदह नच) एक बुद्धिमान निर्णय हो सकता है। यह सुनकर अटपटा लग सकता है, क्योंकि समाज में ‘‘छोड़ना’’ को अक्सर कमजोरी, कायरता या हार के रूप में देखा जाता है। हालाँकि, छोड़ना हमेशा हार मानना नहीं होता। कभी-कभी यह एक रणनीतिक पीछे हटना होता है ताकि आप अपनी ऊर्जा और संसाधनों को बेहतर, अधिक फलदायी अवसरों पर केंद्रित कर सकें। यह इस बात को समझने की परिपक्वता है कि सभी लड़ाइयाँ जीतने लायक नहीं होतीं, और कुछ लक्ष्य आपके समय और प्रयास के लायक नहीं हो सकते हैं।

यह सीखने की प्रक्रिया का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है कि कब किसी स्थिति का पुनर्मूल्यांकन करना है, कब अपने दृष्टिकोण को बदलना है, और कब यह स्वीकार करना है कि एक रास्ता बंद हो गया है। यह हमें अनावश्यक निराशा, हताशा और संसाधनों की बर्बादी से बचाता है। यह हमें एक ऐसे दलदल में फंसने से रोकता है जहाँ हम लगातार प्रयास करते रहते हैं लेकिन कोई वास्तविक प्रगति नहीं होती। वास्तविक बुद्धिमत्ता तब आती है जब हम अपनी सीमाओं को पहचानते हैं और यह समझते हैं कि हमें कब अपनी दिशा बदलनी है।

उदाहरण के लिए, एक रिश्ते में, यदि दो व्यक्ति लगातार संघर्ष कर रहे हैं और सभी प्रयासों के बावजूद समाधान नहीं मिल पा रहा है, तो कभी-कभी अलग हो जाना दोनों पक्षों के लिए सबसे अच्छा निर्णय हो सकता है, जिससे वे अपने जीवन में आगे बढ़ सकें और खुशी पा सकें। इसी तरह, यदि कोई लेखक किसी किताब पर वर्षों से काम कर रहा है और उसे बार-बार प्रकाशकों द्वारा अस्वीकार किया जा रहा है, और उसे लगता है कि वह इस पर और काम नहीं कर सकता, तो क्या यह बेहतर नहीं होगा कि वह उस पांडुलिपि को छोड़ दे और एक नई कहानी या विचार पर काम करना शुरू करे, जहां उसकी रचनात्मक ऊर्जा को एक नया आउटलेट मिल सके?

आत्म-जागरूकता और वास्तविकता का सामना

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हमें आत्म-जागरूकता और वास्तविकता का सामना करने की क्षमता विकसित करनी चाहिए। हमें अपने लक्ष्यों की व्यवहार्यता, अपनी क्षमताओं की सीमाएं, और बाहरी परिस्थितियों के प्रभाव को निष्पक्ष रूप से देखना चाहिए। हमें भावनात्मक लगाव से परे जाकर वस्तुनिष्ठ रूप से स्थिति का विश्लेषण करना चाहिए। यदि कोई लक्ष्य अवास्तविक है, या यदि परिस्थितियाँ लगातार हमारे खिलाफ हैं (जैसे कि एक बाजार जो अब हमारे उत्पाद के लिए प्रासंगिक नहीं है, या एक ऐसी तकनीक जो अप्रचलित हो गई है), तो यह पहचानना महत्वपूर्ण है कि कब छोड़ना है और आगे बढ़ना है। यह हमें अनावश्यक निराशा, हताशा और संसाधनों की बर्बादी से बचाता है।

यह मुश्किल हो सकता है क्योंकि समाज अक्सर छोड़ने को कमजोरी के रूप में देखता है। बचपन से ही हमें सिखाया जाता है कि जीतने वाले कभी हार नहीं मानते, और हार मानने वाले कभी जीतते नहीं। यह एक महान सिद्धांत है, लेकिन इसे विवेक के साथ लागू किया जाना चाहिए। कभी-कभी, छोड़ना ताकत का प्रदर्शन होता है। यह खुद को महत्व देने और अपनी ऊर्जा को बुद्धिमानी से निर्देशित करने का एक कार्य है। यह इस बात को पहचानने का साहस है कि आपकी कोशिशें किसी बंद रास्ते पर बेकार जा रही हैं और अब नए रास्तों की तलाश करने का समय आ गया है।

मानसिक स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से भी, यह महत्वपूर्ण है। लगातार एक ही असफल लक्ष्य के पीछे भागना निराशा, बर्नआउट और आत्म-मूल्य में कमी ला सकता है। अपनी ऊर्जा को ऐसे लक्ष्यों पर केंद्रित करना जो व्यवहार्य हैं और जिनमें सफलता की अधिक संभावना है, मानसिक और भावनात्मक कल्याण के लिए महत्वपूर्ण है |

संतुलन खोजनाः दृढ़ता और बुद्धिमत्ता का मिश्रण

‘‘कोशिश करो, फिर कोशिश करो’’ का मंत्र तब सबसे प्रभावी होता है जब इसमें लचीलापन और अनुकूलनशीलता शामिल हो। इसका मतलब यह नहीं है कि हम एक ही दीवार से बार-बार सिर टकराते रहें और उसी परिणाम की उम्मीद करें। इसका मतलब है कि यदि एक तरीका काम नहीं करता है, तो दूसरा तरीका आज़माएँ। यदि एक दरवाजा बंद हो जाता है, तो दूसरा दरवाजा खोजें। यह दृढ़ता और बुद्धिमत्ता का मिश्रण है।

हमें अपने अनुभवों से सीखना चाहिए, अपनी असफलताओं का विश्लेषण करना चाहिए, और अपनी रणनीति में सुधार करना चाहिए। यदि हम बार-बार असफल हो रहे हैं, तो हमें यह पूछना चाहिएः ‘‘मैं क्या गलत कर रहा हूँ?’’ या ‘‘क्या मेरा दृष्टिकोण गलत है?’’या ‘‘क्या मुझे मदद की ज़रूरत है?’’ यह आत्म-चिंतन हमें बेहतर रास्ते खोजने में मदद करेगा। यह निरंतर सीखना और अनुकूलन करना ही हमें वास्तविक प्रगति की ओर ले जाता है।

जीवन एक प्रयोगशाला की तरह है, जहाँ हम लगातार प्रयोग करते रहते हैं। कुछ प्रयोग सफल होते हैं, कुछ असफल। महत्वपूर्ण यह है कि हम हर प्रयोग से कुछ सीखें, चाहे वह सफल हो या असफल। और कभी-कभी, यह सीखने का सबसे महत्वपूर्ण सबक होता है कि कब एक प्रयोग को समाप्त करना है और कब एक नए पर आगे बढ़ना है।

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निष्कर्ष

संक्षेप में, जबकि ‘‘कोशिश करो, फिर कोशिश करो’’ एक अमूल्य प्रेरणादायक सिद्धांत है, इसे विवेक और आत्म-विश्लेषण के साथ लागू किया जाना चाहिए। हमें यह पहचानने की जरूरत है कि कब हमारी दृृढ़ता फल दे रही है और कब यह सिर्फ हठ बन गई है। हमें यह सीखने की जरूरत है कि कब एक रास्ता छोड़ना है, न कि हार मानकर, बल्कि एक अधिक आशाजनक और फलदायी दिशा में बढ़ने के लिए।

जीवन में सफलता अक्सर उन लोगों को मिलती है जो न केवल अपनी लड़ाई लड़ने में दृढ़ होते हैं, बल्कि यह भी जानते हैं कि कब एक अप्रभावी लड़ाई को छोड़ना है और एक नई, अधिक सार्थक लड़ाई शुरू करनी है। यह जानना कि कब कोशिश करनी है, और कब कोशिश नहीं करनी है, एक ऐसी बुद्धिमत्ता है जो हमें अनावश्यक पीड़ा से बचा सकती है और हमें सच्ची सफलता और संतुष्टि की ओर ले जा सकती है। यह हमें यह समझने में मदद करता है कि जीवन में कुछ भी निरपेक्ष नहीं होता, और सही समय पर सही निर्णय लेना ही हमारी प्रगति का मार्ग प्रशस्त करता है।

सन्दर्भ

1- Leslie Berlin, “Try Try Again or Maybe not, “New York Times, March 21, 2009.

2- Rework:Change the Way You Work Forever By Jason Fried and David Heinemeier Hansson

3- Dr. sumit goel, Wanna Grow Up Once Again

By admin

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