The First 10 Minutes in an Emergency

The First 10 Minutes in an Emergency: Why Emergency Awareness in India Matters

आपातकाल की स्थिति में पहले दस मिनट सबसे अधिक निर्णायक होते हैं, लेकिन भारत में आपातकालीन जागरूकता की दयनीय स्थिति हर घटना को एक आपदा में बदल देती है। क्या हम अपनी पिछली गलतियों से सीखने को तैयार हैं?

नोएडा के सेक्टर-150 में 16-17 जनवरी 2026 की रात को 27 वर्षीय सॉफ्टवेयर इंजीनियर युवराज मेहता की कार पानी से भरे गड्ढे में गिरने से दर्दनाक मौत हो गई। यह घटना सुरक्षा मानकों जैसे सड़क पर कोई बैरिकेडिंग, चेतावनी बोर्ड या रोशनी की अनदेखी के कारण हुई।

गोवा, 2025, हर साल दिसंबर में लोग साल के अंत का जश्न मनाने के लिए जुटते हैं। 6 दिसंबर की रात भी कुछ अलग नहीं थी। अरपोरा बीच स्थित अपस्केल क्लब ‘बर्च बाय रोमियो लेन’ में लोग देर रात तक पार्टी कर रहे थे। तभी आग लग गई और त्रासदी घटित हो गई। अन्ततः 25 लोगों की जान चली गई।

जब घबराहट विवेक पर हावी हो जाती है, जीवन रक्षा की प्रवृत्ति से पहले अफरा-तफरी मच जाती है, और दूरदर्शिता पर भय हावी हो जाता है-भारत में जीवन-मरण की परिस्थितियों में फँसे अधिकांश लोगों की यही प्रतिक्रिया है। शुरुआती वे मिनट-सायरन बजने से पहले, वर्दीधारी कर्मियों के पहुँचने से पहले-ही तय कर देते हैं कि आपातस्थिति किस ओर जाएगी। और आज ये मिनट आग या धुएँ जैसी दिखाई देने वाली चीज़ों से नहीं, बल्कि एक अदृश्य कारण से नष्ट हो रहे हैं-आपातकालीन अशिक्षा

आपातकालीन सेवाओं से जुड़े लोग इन्हें ‘स्वर्णिम मिनट’ कहते हैं। डॉक्टर इसे ‘प्री-हॉस्पिटल गैप’ कहते हैं। समाजशास्त्री इसे ‘बाइस्टैंडर मोमेंट’ कहते हैं। भारत में यह क्षण भ्रम से भरा होता है। आग में अधिकतर मौतें जलने से नहीं, बल्कि धुएँ के कारण होती हैं। फिर भी लोगों को सरल उपाय नहीं पता-नीचे झुककर चलना, दरवाज़े सील करना, नाक और मुँह पर गीला कपड़ा रखना।”

अग्नि-सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि घबराहट अनिवार्य नहीं है। भय प्रायः आपातकालीन प्रक्रियाओं से अपरिचित होने के कारण होता है। जिन इमारतों में नियमित निकासी अभ्यास (एवैक्यूएशन ड्रिल) होते हैं, वहाँ लोग तेज़ी से और शांतिपूर्वक बाहर निकलते हैं। वे अलार्म पहचानते हैं, धुएँ के नीचे रहना जानते हैं, और समझते हैं कि सबसे नज़दीकी निकास वही नहीं होता जिससे वे अंदर आए थे। लेकिन ऐसे उदाहरण बहुत कम हैं। हमंे खुद से पूछिना चाहिए कि-हमने आखारी बार अपने ऑफिस में आपातकालीन अभ्यास में गंभीरता से भाग कब लिया था?

यहाँ तक कि दमकल विभाग को कॉल करना भी सहज नहीं है। बहुत से लोगों को यह भी नहीं पता कि किसे कॉल करना है या क्या जानकारी देनी है।

’’पैनिक बटन दबाना’’

देश भर में हाल की त्रासदियों को देखें तो एक ही तरह की पटकथा बार-बार सामने आती है। संरचनात्मक विफलताओं से निपटने के लिए न तो कोई स्पष्ट सार्वजनिक निर्देश मौजूद हैं और न ही कोई मानक प्रणाली। नतीजतन, मौके पर मौजूद लोग मलबा हटाने में जुट जाते हैं-बिना यह सोचें-समझे कि ढांचे को स्थिर किए बिना ऐसा करना और अधिक ढहने का खतरा पैदा कर सकता है।

कई बार लोग सुरक्षा या भार-वहन के जोखिमों को समझे बिना ही बचाव कार्य में लग जाते हैं और अनजाने में खुद को गंभीर खतरे में डाल लेते हैं। अफरातफरी की स्थिति में लोग घबरा जाते हैं, लिफ्ट और एस्केलेटर की ओर दौड़ पड़ते हैं।
यह घटनाएँ बताती हैं कि यदि बुनियादी निकासी व्यवहार (evacuation Behaviour) की समझ न हो, तो एक मामूली या गैर-घातक आग भी जानलेवा बन सकती है।

विडंबना यह है कि सीढ़ियाँ-जो किसी भी आपात स्थिति में सबसे महत्वपूर्ण निकासी मार्ग होती हैं-अक्सर कचरे, कार्टन, अलमारियों और यहाँ तक कि वाटर कूलरों से घिरी रहती हैं। चूँकि लोग रोज़मर्रा की जिन्दगी में सीढ़ियों का उपयोग नहीं करते, इसलिए आपात स्थिति में उन्हें यह तक पता नहीं होता कि वे स्थित कहाँ हैं।

अक्सर ऐसा देखा गया है कि किसी भवन को एक बार अग्नि एनओसी (Fire NOC) मिल जाने के बाद, उसके रखरखाव और सुरक्षा मानकों के पालन में रुचि समाप्त हो जाती है। सुरक्षा प्रमाणपत्र को स्थायी सुरक्षा का पर्याय मान लिया जाता है, जबकि वास्तविकता इसके ठीक विपरीत होती है।

आपात प्रतिक्रिया में यह लापरवाही एम्बुलेंस बुलाने तक में दिखाई देती है। कई भारतीय एम्बुलेंस बुलाने से हिचकते हैं, क्योंकि उन्हें आशंका रहती है कि या तो वह समय पर नहीं पहुँचेगी या फिर पर्याप्त रूप से सुसज्जित नहीं होगी। यह अविश्वास स्वयं आपात प्रबन्धन व्यवस्था की एक गंभीर विफलता को उजागर करता है।

यह केवल व्यक्तिगत घबराहट या प्रशासनिक चूक का मामला नहीं है, बल्कि सुरक्षा-संस्कृति के अभाव का द्योतक है-जहाँ तैयारी, प्रशिक्षण और निरंतर जागरूकता को आज भी वैकल्पिक माना जाता है, अनिवार्य नहीं।

भ्रम की चिकित्सकीय कीमत’’

अगर कुछ लोग मदद तो करना चाहते हैं लेकिन उन्हें तरीका नहीं पता होता है। नतीजा-रीढ़ की चोट वाले मरीज़ों को गलत तरीके से उठाया जाता है, जिससे अपूरणीय क्षति होती है। जलने पर टूथपेस्ट या तेल लगा दिया जाता है। कार्डियक अरेस्ट पीड़ितों को बुनियादी सीपीआर मिले बिना अस्पताल पहुँचा दिया जाता है।

भारत में अस्पताल के बाहर होने वाले कार्डियक अरेस्ट में जीवित बचने की दर बेहद कम है। हालिया अनुमानों के अनुसार, स्वतः परिसंचरण की वापसी (त्व्ैब्) की दर 10% से भी कम है-जो उन देशों की तुलना में बहुत कम है जहाँ बाइस्टैंडर सीपीआर व्यापक है।

मुख्य कारण जागरूकता और प्रशिक्षण की कमी है। ट्रॉमा, जलन और दुर्घटनाओं में अस्पताल का ‘गोल्डन आवर’ स्थल पर ‘प्लैटिनम दस मिनट’ बन जाता है-और वहीं हम चूक जाते हैं। हैंड्स-ओनली सीपीआर मिनटों में सिखाया जा सकता है। मज़बूत दबाव से रक्तस्त्राव रोका जा सकता है। अग्निशामक यंत्र चलाना किसी ड्रिंक ऑर्डर करने से कम समय लेता है, फिर भी ये जीवन बचाने से सम्बन्धित कौशल नहीं, बल्कि विशेष ज्ञान बने हुए हैं।

कानूनी परिणामों का डर भी लोगों को पीछे खींचता है-जबकि भारत का गुड समैरिटन कानून मदद करने वाले बाइस्टैंडर्स की रक्षा करता है। इस बीच, ऑटोमेटेड एक्सटर्नल डिफिब्रिलेटर (।म्क्)-तीन-स्टेप वॉइस निर्देशों वाले सरल उपकरण-सार्वजनिक स्थानों पर अभी भी दुर्लभ हैं।

कई देशों में सीपीआर सीखना ड्राइविंग सीखने जितना बुनियादी है। भारत में आप 30 साल तक शिक्षक या पुलिस अधिकारी रह सकते हैं और आपको जीवन-रक्षक प्रशिक्षण का एक घंटा भी न मिले।

’’फ्रीज़ की मनोविज्ञान’’

फ्रीज़ की मनोविज्ञान इंसान की एक स्वाभाविक सुरक्षा प्रतिक्रिया है, जिसमें अचानक डर, तनाव या दबाव की स्थिति में व्यक्ति न तो लड़ पाता है और न ही भाग पाता है, बल्कि मानसिक और शारीरिक रूप से जड़-सा हो जाता है; यह दिमाग़ की थ्पहीज.थ्सपहीज.थ्तमम्रम प्रणाली का हिस्सा है, जहाँ मस्तिष्क संभावित खतरे को भाँपकर अस्थायी रूप से सोचने, बोलने और प्रतिक्रिया देने की क्षमता को रोक देता है, ताकि व्यक्ति खुद को सुरक्षित रख सके-यह कमजोरी नहीं बल्कि अवचेतन मन की स्वतः सक्रिय होने वाली जीवन-रक्षक प्रक्रिया है।

अभ्यास सही प्रतिक्रिया को स्वचालित बनाते हैं। जब तर्कसंगत मस्तिष्क बंद हो जाता है, शरीर सबसे अधिक अभ्यास की गई आदत पर लौट आता है। यदि लोगों ने निकासी मार्ग कई बार तय किया है, तो उन्हें सोचने की ज़रूरत नहीं पड़ती- फ्रीज़ की स्थिति में मोटर कॉर्टेक्स काम संभाल लेता है, यानी सोचने-समझने वाला हिस्सा (प्रीफ्रंटल कॉर्टेक्स) दब जाता है और दिमाग़ नियंत्रण को अधिक स्वचालित तंत्र को सौंप देता है; नतीजतन प्रतिक्रियाएँ सचेत निर्णय से नहीं बल्कि आदतन या रिफ़्लेक्स-आधारित होती हैं, जिससे व्यक्ति बोलने, हिलने या तुरंत निर्णय लेने में असमर्थ-सा महसूस करता है।

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बाइस्टैंडर मत बनिए

आपदाओं के बाद जीवित बचे लोग अक्सर वही क्षण याद करते हैं-दीवार से टिका कोई व्यक्ति, साँस के लिए जूझता दोस्त, खून से लथपथ कोई अजनबी। आपातकालीन अशिक्षा बाइस्टैंडर्स को जवाब देने वाले नहीं, सिर्फ़ दर्शक बना देती है। पहले दस मिनट दमकलकर्मियों, डॉक्टरों या एम्बुलेंस के नहीं होते-वे आम लोगों के होते हैं। हर त्रासदी में भ्रम सबसे घातक शक्ति बना रहता है।

भीड़, भ्रम और झुंड प्रवृत्ति

बड़े जमावड़ों में भ्रम संक्रामक हो जाता है और किसी भी भीड़-आपातस्थिति में विफलता की शुरुआत अक्सर खतरे को समय रहते पहचानने तथा प्रभावी प्रतिक्रिया देने में असमर्थता से होती है; इसके लिए भीड़ की गति, स्थानिक विन्यास और सामूहिक भावनात्मक अवस्था की सूक्ष्म समझ अनिवार्य है। इसके बावजूद, भीड़ प्रबंधन करने वाले प्रायः तैयार नहीं होते।

निजी सुरक्षा एजेंसियों (विनियमन) अधिनियम के तहत बाउंसरों और निजी सुरक्षा कर्मियों को आपदा प्रतिक्रिया, प्राथमिक उपचार, अग्निशमन और भीड़ नियंत्रण का प्रशिक्षण कानूनी रूप से आवश्यक है, लेकिन व्यवहार में इसका अनुपालन अधूरा रहता है। 1997 के उपहार सिनेमा अग्निकांड से लेकर गोवा 2025 तक की घटनाएँ बार-बार दिखाती हैं कि नियमित अभ्यास, स्पष्ट संचार और यथार्थपरक सिमुलेशन की उपेक्षा कितनी भारी कीमत वसूलती है।

अवसंरचना की विफलताएँ मानवीय त्रुटियों को और बढ़ा देती हैं। कई स्थल अच्छी तरह बने होते हैं, लेकिन रखरखाव खराब होता है, जिससे सुरक्षा प्रणालियाँ बेकार हो जाती हैं। सुरक्षा अनुबंध सबसे कम बोली पर दे दिए जाते हैं। हर अग्निशामक बाहर से एक जैसा दिख सकता है, लेकिन अंदर की गुणवत्ता बहुत अलग होती है-अंदर क्या है, वही जान बचाता है।

समाजशास्त्री मानते हैं कि कमज़ोर अवसंरचना के साथ-साथ कमज़ोर सार्वजनिक तैयारी भी जुड़ी होती है। भारत में नागरिकों के लिए आपातस्थिति में क्या करना चाहिए, इस विषय पर कोई समर्पित, सर्वसुलभ दिशानिर्देश उपलब्ध नहीं हैं। परिणामस्वरूप, आपदा-तैयारी को प्रायः केवल सरकार की ज़िम्मेदारी मान लिया जाता है। यह धारणा नियतिवाद को जन्म देती है, जिसमें लोग स्वयं को असहाय, उदासीन और अप्रस्तुत महसूस करने लगते हैं, और संकट के क्षणों में सक्रिय भूमिका निभाने के बजाय निष्क्रिय बने रहते हैं।

आपातकालीन साक्षरता का मालिक कौन?

दुनिया भर में आपदा-जोखिम शिक्षा की शुरुआत स्कूलों से होती है। भारत में, सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों और 2025 में शिक्षा मंत्रालय द्वारा अनिवार्य ऑडिट के बावजूद, कई स्कूलों में प्रशिक्षित स्टाफ, नियमित अभ्यास या शिक्षकों के लिए प्रमाणन का अभाव है। समस्या संरचनात्मक भी है। आपात तैयारी कई अधिकार क्षेत्रों के बीच बँटी हुई है-राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) आपदाओं को देखता है, शिक्षा बोर्ड पाठ्यक्रम नियंत्रित करते हैं। ‘आपातकालीन साक्षरता’ का कोई एक स्वामी नहीं है। देश में निजी संगठन मौजूद हैं-पर समन्वय सीमित है। अधिकांश पेशों के लिए सीपीआर प्रमाणन अनिवार्य करने वाला कोई कानून भी नहीं है।

जापान, सिंगापुर, इज़राइल, नॉर्वे जैसे देशों ने राष्ट्रीय आपात शिक्षा में निवेश किया है, तो वहाँ जीवित बचाने की दरें कहीं अधिक हैं। भारत की जनसंख्या घनत्व, तेज़ शहरीकरण और उच्च-फुटफॉल सार्वजनिक स्थल यह संकेत देते हैं कि आपातस्थितियाँ दुर्लभ अपवाद नहीं, बल्कि सांख्यिकीय अनिवार्यता हैं।

भारतीय आपदाओं में अधिकांश मौतें प्राथमिक खतरे से नहीं, बल्कि द्वितीयक विफलताओं से होती हैं-भ्रम, खराब भीड़ प्रवाह, अप्रशिक्षित स्टाफ और तत्काल चिकित्सकीय प्रतिक्रिया का अभाव। बड़े पैमाने पर आपात शिक्षा के बिना, छोटी घटनाएँ बड़े हादसों में बदलती रहेंगी।

समाधान क्या है?

एक राष्ट्रीय आपातकालीन साक्षरता मिशन की शुरुआत-जो सीपीआर, प्राथमिक उपचार, निकासी प्रोटोकॉल, एईडी की उपलब्धता और सामुदायिक रिस्पॉन्डर नेटवर्क को रोज़मर्रा के जीवन में शामिल किया जाना चाहिए। तब तक, जीवित बचना महज़ संयोग और किस्मत पर निर्भर रहेगा।

Reference:-

  1. First Aid for Emergencies: Bleeding, Burns, Choking & More
  2.  The Economics Time
  3. First aid in an emergency situation

By admin

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