Disconnect to Reconnect

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लगभग हर सुबह, फरवरी से मार्च के बीच, हम अपने शयन कक्ष की खिड़की के बाहर किसी जादू के घटित होने की उम्मीद कर सकते हैं। ऊधमसिंहनगर के खटीमा में-एक हरे-भरे गांव-में यह दृश्य आम है। गौरैया एक छोटी और प्यारी चिड़िया, जिसका रंग भूरा और सफेद होता है। यह अक्सर घरों की छतों, पेड़ों और दीवारों में अपना घोंसला बनाती है।

गौरैया दाने, अनाज और छोटे कीड़े खाती है। सुबह-सुबह इसकी मीठी चहचहाहट सुनाई देती है। एक नर गौरैया आम के पेड़ की डाल पर उतरता है, अपने आगमन की चहचहाहट करता है और फिर एक तयशुदा दिनचर्या में लग जाता है। कभी-कभी वह बेहद नज़ाकत और कुशलता से नीचे बने जलकुंड में गोता लगाता है, फिर लौट कर अपने पंख साफ़ करता है।

यह पक्षी किसी भी व्यक्ति को-चाहे ईमेल कितना ही तात्कालिक क्यों न हो-अपने काम से दूर खींच लेने की क्षमता रखता है। हाँ, इस मौसम में जादू सचमुच प्रकट होता है।

ऐसा मोहक अनुभव नए ‘री-कनेक्ट’ का प्रवेश द्वार बन सकता है। लोग डिजिटल उपकरणों से कटना (डिसकनेक्ट) चाहते हैं, लेकिन हमें किसी ऐसी चीज़ की ज़रूरत है जिससे हम फिर से जुड़ सकें। हम मशीनों से अत्यधिक जुड़े हुए हैं और लोगों से उतने ही कटे हुए।  डिस्कनेक्ट होना कोई विलासिता नहीं है। डिस्कनेक्ट होना सिर्फ़ एक ब्रेक नहीं है; यह वह अवस्था हैजहाँ मस्तिष्क जीवित रहने की मानसिकता से निकलकर कल्पना और सृजन की ओर बढ़ता है।

पूर्वोत्तर भारत की पहचान और दर्द

कुछ पीढ़ियाँ पहले तक, हमारे अधिकांश पूर्वज मिट्टी से जुड़े पेशों में थे-या उन वस्तुओं के व्यापार से, जो मिट्टी में उगती थीं। उनके इंद्रियों का तेज़ होना आवश्यक था, ताकि वे अपने आसपास की वास्तविक दुनिया को परख सकें-साँप की फुफकार, तेंदुए की आहट, या शिकारी पक्षी की चीख। यदि आप इन्हें महसूस नहीं कर पाते, तो फसलें, पशुधन-या उससे भी अधिक-खो सकते थे। आपको यह जानना होता था कि हवा कैसे करवट बदलती है, ज्वार-भाटा कैसा है, बारिश कैसे गिरती है, या धरती कब झुलस सकती है।

आज बहुत कम पाठक प्रकृति से वैसी तादात्म्य स्थापित कर पाते हैं। हमारी प्राचीन प्रवृत्तियाँ कुंद हो गई हैं, भले ही अन्य कौशल निखर गए हों। इसलिए, यदि हम भविष्य की ओर लौटते हुए यात्रा करना चाहते हैं-यानी जो हमने खो दिया है उसे फिर पाना चाहते हैं-तो हमें बच्चों की तरह शुरुआत करनी होगी।

आज की तेज़-रफ्तार और तनाव पूर्ण ज़िंदगी में लोग सुकून और शांति की तलाश में फिर से प्रकृति की ओर लौट रहे हैं। अगर आप डिजिटल डिटॉक्स की कल्पना करते हैं तो आप अपना फ़ोन अनप्लग कर दें, उसे पीछे छोड़ दें और सूर्यास्त की ओर निकल जाएँ। तकनीक तब समस्या बन जाती है जब वह केवल एक उपकरण न रहकर आपकी भावनाओं को नियंत्रित करने लगे। ऊँची इमारतों, लगातार बजते मोबाइल फ़ोन और भागदौड़ भरी दिनचर्या से थककर अब लोग हरियाली, खुले आकाश और स्वच्छहवा की ओर आकर्षित हो रहे हैं। पहाड़, जंगल, नदियाँ और समुद्र-ये सभी स्थान मानसिक शांति देने वाले प्राकृतिक आश्रय बनते जा रहे हैं।

हर कोई सोशल मीडिया पर अपनी ज़िंदगी बेहतर दिखाने की कोशिश करता है। लेकिन वास्तविक समय में जीने पर पता चलता है कि हमारी ज़िंदगी ऑनलाइन दिखने से कहीं बेहतर है। आज की दुनिया में सबसे मूल्यवान चीज़ हमारा समय है।

विशेषज्ञों का मानना है कि प्रकृति के निकट समय बिताने से मानसिक स्वास्थ्य में उल्लेखनीय सुधार होता है। पेड़ों के बीच टहलना, पक्षियों की आवाज़ सुनना या बहते पानी को देखना तनाव को कम करता है और मन को स्थिर करता है। यही कारण है कि आजकल ‘नेचरट्रैवल’, ‘ईको-टूरिज़्म’ और ‘ऑफ-ग्रिडलिविंग’ जैसी अवधारणाएँ लोकप्रिय हो रही हैं।

कोविड महामारी के बाद यह प्रवृत्ति और भी तेज़ हुई है। लोगों ने महसूस किया किसी मित संसाधनों और बंद जगहों में रहने की तुलना में खुली प्राकृतिक जगहें अधिक सुरक्षित और सुकून देने वाली हैं। कई परिवार अब छुट्टियाँ मनाने के लिए शहरी होटलों के बजाय पहाड़ी गाँवों, वन क्षेत्रों या समुद्र तटों को चुन रहे हैं।

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प्रकृति से जुड़ाव केवल घूमने-फिरने तक सीमित नहीं है। लोग अब अपने घरों में भी पौधे लगा रहे हैं, जैविक खेती अपना रहे हैं और पर्यावरण-अनुकूल जीवन शैली की ओर बढ़ रहे हैं। यह बदलाव इस बात का संकेत है कि आधुनिक समाज फिर से संतुलन की तलाश में है-जहाँ विकास के साथ-साथ प्रकृति का सम्मान भी हो।

अंततः, प्रकृति की ओर यह पलायन केवल एक ट्रेंड नहीं, बल्कि एक आवश्यकता बनता जा रहा है। यह हमें याद दिलाता है कि असली शांति और संतोष कृत्रिम साधनों में नहीं, बल्कि प्राकृतिक दुनिया के साथ सामंजस्य में छिपा है।

Reference:-

1. The Economic Times

By admin

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