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Why Is Silver Shining? Understanding the Reasons Is Important
नववर्ष 2026 आते ही जीवन को बेहतर बनाने के संकल्प लिए जाते हैं। कोई स्वास्थ्य सुधारने की बात करता है, कोई समय प्रबंधन की, तो कोई करियर और रिश्तों को लेकर योजनाएँ बनाता है। लेकिन इन सभी संकल्पों के बीच एक ऐसा क्षेत्र है, जिसे अक्सर नज़रअंदाज़ कर दिया जाता है-धन से जुड़े निर्णयों की समझ।
वास्तव में, नए साल पर जीवन को बेहतर बनाने के लिए सबसे आवश्यक संकल्प यही होना चाहिए कि हम पैसों को लेकर अधिक समझदार बनें, भावनाओं के बजाय तथ्यों के आधार पर फैसले लें और निवेश को लेकर दीर्घकालिक दृष्टिकोण विकसित करें।
इन्हीं दिनों एक सवाल बार-बार उठ रहा है- Why Is Silver Shining?
क्या यह केवल कीमतों में आई तेज़ी का नतीजा है या इसके पीछे कोई ठोस आर्थिक कारण हैं? और सबसे अहम सवाल-क्या चांदी वास्तव में संपत्ति जोड़ने का भरोसेमंद साधन बन सकती है?

चांदी- निवेश नहीं, एक उत्पाद
सबसे पहले यह समझना ज़रूरी है कि चांदी एक उत्पाद है। यह शेयर्स या म्यूचुअल फण्डस से अलग है। यह शेयर या म्यूचुअल फंड की तरह किसी व्यवसाय में स्वामित्व का प्रतिनिधित्व नहीं करती। इससे न तो लाभांश (Dividend) मिलता है और न ही साल-दर-साल चक्रवृद्धि ब्याज (Compounding) का फायदा।
चांदी का मूल्य मुख्य रूप से मांग और आपूर्ति (Demand & Supply) के नियमों से तय होता है। जब मांग तेजी से बढ़ती है और आपूर्ति सीमित रहती है, तब कीमतें ऊपर जाती हैं। इसके विपरीत, यदि मांग घटती है या आपूर्ति बढ़ जाती है, तो चांदी का दाम गिरने लगता है। यानी चांदी की कीमतें किसी कंपनी की प्रगति, मुनाफे या आर्थिक दक्षता से नहीं, बल्कि वैश्विक परिस्थितियों से प्रभावित होती हैं।
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भारतीय घरों में चांदी की परंपरा
भारत में चांदी का रिश्ता केवल निवेश से नहीं, बल्कि परंपरा और भावनाओं से जुड़ा रहा है। भारतीय घरों में त्यौहार के अवसर पर या गहने के रूप में या उपहार देने के लिए हम चांदी खरीदते हैं। यह सोच गलत नहीं थी। पीढ़ी दर पीढ़ी चांदी को सम्भालकर रखने पर जोर दिया गया, परन्तु आज इसे एक अन्य दृष्टिकोण से देखने की आवश्यकता है।
यह सोच अपने समय में गलत नहीं थी। उस दौर में विकल्प सीमित थे, बैंकिंग और निवेश के साधन आज जैसे विकसित नहीं थे। लेकिन आज की आर्थिक दुनिया में, चांदी को केवल भावनात्मक दृष्टि से नहीं, बल्कि आर्थिक यथार्थ के चश्मे से देखने की ज़रूरत है।
चांदी- एक औद्योगिक धातु
सिल्वर एक औद्योगिक धातु भी है। इसे सोलर पैनल, इलेक्ट्रॉनिक वाहनों, इलेक्ट्रॉनिक्स, चिकित्सीय उपकरणों और कई प्रौद्योगिकी मे इस्तेमाल किया जाता है। चांदी की सर्वाधिक मांग मुख्यतः औद्योगिक क्षेत्र में होती है। आज पूरी दुनिया क्लीन एनर्जी और ग्रीन टेक्नोलॉजी की ओर तेजी से बढ़ रही है, उसी गति से चांदी की मांग भी बढ़ रही है, जबकि चांदी की आपूर्ति सीमित है।
चांदी का खनन आसानी से नहीं बढ़ाया जा सकता। चांदी की नई खनन आसानी से नहीं बढ़ाया जा सकता है। चांदी की खदानें विकसित करने में कई वर्ष लगते हैं। रीसाईक्लिंग से मदद मिलती है, लेकिन इससे बढ़ती मांग को पूरा नहीं किया जा सकता। मांग और आपूर्ति के मध्य यही अन्तर हाल के दिनों में चांदी की कीमतों में उछाल का मुख्य कारण है।
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मांग बढ़ रही है, आपूर्ति सीमित है
चांदी की आपूर्ति उतनी लचीली नहीं है जितनी मांग। नई खदानें विकसित करना आसान नहीं होता। इसमें कई साल लगते हैं-कभी-कभी एक दशक से भी ज़्यादा। पर्यावरणीय नियम, लागत और भू-राजनीतिक कारण भी खनन को सीमित करते हैं। रीसाइक्लिंग से कुछ हद तक आपूर्ति बढ़ती है, लेकिन यह बढ़ती औद्योगिक मांग को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं है। यही मांग और आपूर्ति के बीच का अंतर हाल के वर्षों में चांदी की कीमतों में तेज़ उछाल का प्रमुख कारण बना है।
कीमतों में ऐतिहासिक उछाल
भारत में वर्ष 2025 की शुरुआत में चांदी की कीमत लगभग 87,000 से 90,000 रुपये प्रति किलोग्राम के बीच थी। लेकिन साल के अंत तक यह कीमत ढाई लाख रुपये प्रति किलोग्राम के आसपास पहुँच गई। महज़ एक साल में 180-190 प्रतिशत की यह बढ़त ऐतिहासिक मानी जा सकती है।
स्वाभाविक है कि ऐसी तेज़ी देखकर लोगों को लगने लगा कि चांदी एक शानदार निवेश विकल्प है। लेकिन यहीं पर इतिहास हमें सावधान करता है।
इतिहास से मिलने वाला सबक
चांदी में उतार-चढ़ाव आता है। वर्ष 2011 को भारत में चांदी ने लगभग 75,000 रुपये प्रति किलोग्राम का स्तर छुआ था, जो उस समय रिकॉर्ड था। इस मूल्य वृद्धि के बाद दाम में तेजी से घटे और कई वर्ष तक यह कमजोर स्थिति कायम रही। वर्ष 2023 तक में बदलाव दर्ज किया गया।
चांदी को मजबूती मिली और इसका मूल्य प्रति किलोग्राम 75 हजार रूपये को पार कर गया अर्थात 12 सालों तक इसे लेकर मायूसी रही होगी। चांदी की कीमतें नाटकीय ढ़ग से बढ़ती हैं, पर ये लम्बे समय तक आपके धैर्य की परीक्षा भी लेती चांदी कोई सधा हुआ, स्थिर निवेश नहीं है। इसके अच्छे परिणाम उसी को मिलते हैं, जो यथार्थ के साथ तालमेल बनाकर चलते हैं, न कि उन्हें जो अति उत्साह में निर्णय लेते हैं।
क्या चांदी संपत्ति जोड़ने का साधन है?
तो क्या चांदी एक प्रकार से सम्पत्ति जोड़ने का नया विकल्प है ? ईमानदारी से इसका उत्तर नहीं में है। चांदी का मूल्य अवश्य है, पर इसे मुख्यतः सम्पत्ति मानकर जोड़ना ठीक नहीं होगा। यह इक्विटी, म्यूचुउल फण्ड या दीर्घकाालिक निवेश का विकल्प नहीं है। इससे धन की बढ़त नहीं होती । इसके साथ कोई चक्रवृद्धि ब्याज नहीं जुड़ता। इसका मूल्य बना रहता है और ग्लोबल ट्रेण्डस से कुछ लाभ हो सकता है, पर इसमें निवेश आपके पोर्टफोलियों में अन्य विकल्पों पर हावी नहीं होना चाहिए।
धन से जुड़ी अपनी कहानी में चांदी को नायक के बजाय सहायक के तौर पर देखना चाहिए। भारतीय महिलाएं इस सच को भली भांति समझती है। दशकों तक यह देखा गया है कि भारतीय घरों में चांदी की खरीद का उदृदेष्य लाभ के लिए नहीं था। हां, चांदी को लम्बे समय तक सम्भालकर रखने का भाव अवश्य था। यही वजह है कि कई घरों में चांदी उनकी मजबूती का आधार बन गया।
मांग बढ़ रही है, आपूर्ति सीमित है
चांदी की आपूर्ति उतनी लचीली नहीं है जितनी मांग। नई खदानें विकसित करना आसान नहीं होता। इसमें कई साल लगते हैं-कभी-कभी एक दशक से भी ज़्यादा। पर्यावरणीय नियम, लागत और भू-राजनीतिक कारण भी खनन को सीमित करते हैं।
रीसाइक्लिंग से कुछ हद तक आपूर्ति बढ़ती है, लेकिन यह बढ़ती औद्योगिक मांग को पूरा करने के लिए पर्याप्त नहीं है। यही मांग और आपूर्ति के बीच का अंतर हाल के वर्षों में चांदी की कीमतों में तेज़ उछाल का प्रमुख कारण बना है।
कीमतों में ऐतिहासिक उछाल
भारत में वर्ष 2025 की शुरुआत में चांदी की कीमत लगभग 87,000 से 90,000 रुपये प्रति किलोग्राम के बीच थी। लेकिन साल के अंत तक यह कीमत ढाई लाख रुपये प्रति किलोग्राम के आसपास पहुँच गई। महज़ एक साल में 180-190 प्रतिशत की यह बढ़त ऐतिहासिक मानी जा सकती है।
स्वाभाविक है कि ऐसी तेज़ी देखकर लोगों को लगने लगा कि चांदी एक शानदार निवेश विकल्प है। लेकिन यहीं पर इतिहास हमें सावधान करता है।
इतिहास से मिलने वाला सबक
चांदी में उतार-चढ़ाव आता है। 25 अप्रैल 2011 को भारत में चांदी ने लगभग 75,000 रुपये प्रति किलोग्राम का स्तर छुआ था, जो उस समय रिकॉर्ड था। इस मूल्य वृद्धि के बाद दाम में तेजी से घटे और कई वर्श तक यह कमजोर स्थिति कायम रही।
वर्श 2023 तक में बदलाव दर्ज किया गया। चांदी को मजबूती मिली और इसका मूल्य प्रति किलोग्राम 75 हजार रूपये को पार कर गया अर्थात 12 सालों तक इसे लेकर मायूसी रही होगी। चांदी की कीमतें नाटकीय ढ़ग से बढ़ती हैं, पर ये लम्बे समय तक आपके धैर्य की परीक्षा भी लेती चांदी कोई सधा हुआ, स्थिर निवेश नहीं है।
इसके अच्छे परिणाम उसी को मिलते हैं, जो यथार्थ के साथ तालमेल बनाकर चलते हैं, न कि उन्हें जो अति उत्साह में निर्णय लेते हैं।
क्या चांदी संपत्ति जोड़ने का साधन है?
तो क्या चांदी एक प्रकार से सम्पत्ति जोड़ने का नया विकल्प है ? ईमानदारी से इसका उत्तर नहीं में है। चांदी का मूल्य अवश्य है, पर इसे मुख्यतः सम्पत्ति मानकर जोड़ना ठीक नहीं होगा। यह इक्विटी, म्यूचुउल फण्ड या दीर्घकाालिक निवेश का विकल्प नहीं है। इससे धन की बढ़त नहीं होती । इसके साथ कोई चक्रवृद्धि ब्याज नहीं जुड़ता।
इसका मूल्य बना रहता है और ग्लोबल ट्रेण्डस से कुछ लाभ हो सकता है, पर इसमें निवेश आपके पोर्टफोलियों में अन्य विकल्पों पर हावी नहीं होना चाहिए। धन से जुड़ी अपनी कहानी में चांदी को नायक के बजाय सहायक के तौर पर देखना चाहिए। भारतीय महिलाएं इस सच को भली भांति समझती है। दशकों तक यह देखा गया है कि भारतीय घरों में चांदी की खरीद का उदृदेष्य लाभ के लिए नहीं था।
हां, चांदी को लम्बे समय तक सम्भालकर रखने का भाव अवष्य था। यही वजह है कि कई घरों में चांदी उनकी मजबूती का आधार बन गया।

निवेश से पहले सही सवाल
नए साल में सवाल यह नहीं होना चाहिए कि चांदी की कीमत बढ़ेगी या घटेगी।
सही सवाल यह होना चाहिए-
क्या चांदी मेरी आर्थिक यात्रा में सहायक होगी?
कितनी मात्रा में इसे पोर्टफोलियो में रखना चाहिए?
लक्ष्मी वहीं टिकती है, जहाँ फैसले समझदारी से लिए जाते हैं।
निष्कर्ष
चांदी चमक रही है, इसमें कोई शक नहीं। लेकिन यह चमक स्थायी संपत्ति निर्माण का वादा नहीं करती। चांदी को समझदारी से, सीमित मात्रा में और सही भूमिका में रखना ही बुद्धिमानी है। नए साल का सबसे बड़ा संकल्प यही होना चाहिए-धन को लेकर भावनात्मक नहीं, विवेकपूर्ण निर्णय।
सन्दर्भ-दैनिक जागरण