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क्या आपने कभी महसूस किया है कि सोशल मीडिया स्क्रॉल करने के बाद आपका मन पहले से ज़्यादा भारी हो जाता है? क्या दूसरों की परफेक्ट ज़िंदगी देखकर आप अपने जीवन को कमतर आँकने लगते हैं? यदि हाँ, तो आप अकेले नहीं हैं। सोशल मीडिया की तुलना-प्रधान संस्कृति हमारे अवचेतन मन पर गहरा प्रभाव डाल रही है, जिससे ईर्ष्या, असंतोष और मानसिक तनाव लगातार बढ़ रहा है।
social media comparison
आज के डिजिटल युग में सोशल मीडिया हमारे जीवन का अभिन्न हिस्सा बन चुका है। सुबह आँख खुलते ही मोबाइल स्क्रीन पर उँगली चलने लगती है और रात को सोने से पहले आख़िरी नज़र भी उसी पर जाती है। यह आदत इतनी स्वाभाविक हो चुकी है कि हम यह समझ ही नहीं पाते कि इसका हमारे मन और सोच पर कितना गहरा प्रभाव पड़ रहा है।
जब हम बिना सोचे-समझे सोशल मीडिया फीड्स को लगातार स्क्रॉल करते रहते हैं, तो हमारा अवचेतन मन आदर्श जीवन, परिपूर्ण शरीर, सफलता और खुशहाली की चमकदार छवियों से भर जाता है। ये छवियाँ धीरे-धीरे हमारे भीतर तुलना की भावना पैदा करती हैं और हमें यह महसूस कराने लगती हैं कि हमारा जीवन किसी और के जीवन जितना अच्छा नहीं है।
सोशल मीडिया केवल एक संचार माध्यम नहीं रह गया है, बल्कि यह अरबों डॉलर का ऐसा उद्योग बन चुका है, जो मूल रूप से ईर्ष्या और तुलना पर आधारित है। इसके एल्गोरिद्म इस तरह डिज़ाइन किए गए हैं कि वे हमें वही सामग्री बार-बार दिखाते हैं, जो हमारी इच्छाओं को उकसाए, हमें रुकने पर मजबूर करे और हमारे भीतर यह भावना पैदा करे कि हमें भी वैसा ही बनना चाहिए।
किसी का आलीशान घर, किसी की महंगी कार, किसी का सफल व्यवसाय या किसी की परिपूर्ण पारिवारिक तस्वीरेंकृये सब हमें यह सोचने पर मजबूर कर देती हैं कि हमारे जीवन में कुछ कमी है, जबकि वास्तविकता इससे कहीं अधिक जटिल होती है।

धीरे-धीरे सोशल मीडिया पर मान्यता पाने की भूख बढ़ने लगती है। लाइक, कमेंट और शेयर हमारे आत्मसम्मान का पैमाना बन जाते हैं। हम ऐसी तस्वीरें और पोस्ट साझा करने लगते हैं, जो दूसरों में ईर्ष्या पैदा करें या कम से कम हमें यह महसूस कराएँ कि हम भी “महत्वपूर्ण” हैं।
यदि प्रतिक्रिया अपेक्षा से कम मिलती है, तो मन में असंतोष और आत्म-संदेह पैदा होता है। इस तरह हमारी खुशी बाहरी स्वीकृति पर निर्भर होने लगती है, जो कभी स्थायी नहीं होती।
डिजिटल समाज में केवल तुलना ही नहीं, बल्कि आलोचना और ट्रोलिंग की संस्कृति भी तेज़ी से बढ़ी है। सोशल मीडिया और डिजिटल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर उत्तेजक सुर्खियाँ, कटाक्ष भरी टिप्पणियाँ और सार्वजनिक आलोचना को सामान्य मान लिया गया है।
लोग अपनी ईर्ष्या, असुरक्षा और गुस्से को दूसरों पर टिप्पणी करके व्यक्त करते हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि यह सामाजिक रूप से स्वीकार्य है। यह प्रवृत्ति न केवल दूसरों को मानसिक रूप से नुकसान पहुँचाती है, बल्कि समाज में सहानुभूति और संवेदनशीलता को भी कमजोर करती है।
Mental Health in Modern Life: The Hidden Cost of Materialism
अक्सर ऐसा होता है कि हम सोशल मीडिया खोलते समय बिल्कुल ठीक महसूस कर रहे होते हैं, लेकिन कुछ ही मिनटों बाद मन भारी हो जाता है। इसका कारण यह है कि हम लगातार ऐसे जीवन से अपनी तुलना करने लगते हैं, जो वास्तविक नहीं होता। सोशल मीडिया हमें संघर्ष, असफलता, थकान और असुरक्षा नहीं दिखाता।
वह केवल अंतिम परिणाम, मुस्कुराते चेहरे और चमकदार पलों को प्रस्तुत करता है। जब हमारा वास्तविक जीवन इस डिजिटल परफेक्शन से मेल नहीं खाता, तो हम खुद को कमतर समझने लगते हैं।
सोशल मीडिया पर दिखाई देने वाला अधिकांश कंटेंट मंचित, पूर्व-नियोजित और संपादित होता है। फ़िल्टर, एंगल, लाइटिंग और एडिटिंग के ज़रिये एक ऐसा जीवन दिखाया जाता है, जो वास्तव में मौजूद नहीं होता।
यह एक मृगमरीचिका की तरह है, जिसे पाने के लिए हम लगातार प्रयास करते रहते हैं। हम यह समझ ही नहीं पाते कि इस दौड़ में हम अपने वर्तमान जीवन की सराहना करना भूलते जा रहे हैं और इंद्रधनुष के सिरे पर रखे काल्पनिक सोने के हंडे की तलाश में अपनी मानसिक शांति खो रहे हैं।
हम यह तो जानते हैं कि अत्यधिक शराब पीना, अपनी क्षमता से अधिक खर्च करना, विषाक्त रिश्तों में बने रहना या महत्वपूर्ण कार्यों को टालते रहना खुद को नुकसान पहुँचा सकता है, लेकिन बहुत कम लोग यह समझ पाते हैं कि असंतुलित सोशल मीडिया उपयोग भी आत्म-नुकसान का एक रूप है।
यह धीरे-धीरे हमारे आत्मविश्वास, एकाग्रता और संतोष को कम करता चला जाता है। हम जितना अधिक दूसरों के जीवन में झाँकते हैं, उतना ही अपने जीवन से असंतुष्ट होने लगते हैं।
हालाँकि यह कहना भी सही नहीं होगा कि सोशल मीडिया पूरी तरह नकारात्मक है। सही तरीके से उपयोग किया जाए, तो यह सीखने, जुड़ने, प्रेरित होने और मनोरंजन का एक शक्तिशाली माध्यम बन सकता है।
समस्या प्लेटफॉर्म में नहीं, बल्कि हमारे उपयोग के तरीके में है। जब हम बिना जागरूकता के, बिना सीमा के और बिना उद्देश्य के इसका उपयोग करते हैं, तब यह हमारे मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित करने लगता है।
सोशल मीडिया को स्वस्थ बनाने का पहला कदम है अपनी फीड को सही करना। जिन अकाउंट्स की पोस्ट देखकर आपको बार-बार ईर्ष्या, असंतोष या हीनता महसूस होती है, उन्हें अनम्यूट या अनफॉलो करना बिल्कुल सही निर्णय है।
यह आत्म-देखभाल का हिस्सा है, न कि स्वार्थ। इसके स्थान पर ऐसे लोगों और पेजों को फॉलो करना चाहिए, जो आपको प्रेरित करें, यथार्थवादी दृष्टिकोण दें और सकारात्मक सोच को बढ़ावा दें। आपकी फीड वही होनी चाहिए, जो आपके मन को पोषण दे, न कि उसे थकाए।

दूसरा महत्वपूर्ण कदम है ध्यानपूर्वक स्क्रॉल करना। लक्ष्यहीन स्क्रॉलिंग न केवल समय बर्बाद करती है, बल्कि मानसिक ऊर्जा भी चुरा लेती है। जब भी आप किसी ऐप को खोलें, तो यह समझने की कोशिश करें कि आप वहाँ क्यों जा रहे हैं।
यदि आप किसी पोस्ट को देखकर असहज महसूस करते हैं, तो उस भावना को नज़रअंदाज़ न करें। उसे पहचानें और स्वीकार करें। यह जागरूकता आपको धीरे-धीरे डिजिटल संतुलन की ओर ले जाएगी।
अंततः हमें यह समझने की आवश्यकता है कि सोशल मीडिया पर दिखने वाला जीवन पूर्ण सत्य नहीं होता। वास्तविक जीवन में उतार-चढ़ाव, संघर्ष और अधूरापन स्वाभाविक हैं।
जब हम अपने जीवन को उसी रूप में स्वीकार करना सीखते हैं, तब दूसरों की चमक हमें विचलित नहीं करती। आत्म-सराहना, कृतज्ञता और संतुलन ही मानसिक शांति की वास्तविक कुंजी हैं।
सोशल मीडिया न तो पूरी तरह दुश्मन है और न ही खुशी की गारंटी। यह केवल एक उपकरण है, और हर उपकरण की तरह इसका प्रभाव इस बात पर निर्भर करता है कि हम इसका उपयोग कैसे करते हैं।
यदि हम जागरूक रहें, सीमाएँ तय करें और अपने मानसिक स्वास्थ्य को प्राथमिकता दें, तो सोशल मीडिया हमें नुकसान पहुँचाने के बजाय सशक्त बना सकता है।
अंत में यह याद रखना ज़रूरी है कि हमारा जीवन किसी फ़िल्टर, लाइक या तुलना से कम नहीं है, और वास्तविक संतोष बाहर नहीं, बल्कि भीतर से आता है।
सन्दर्भः-
1. मैनिफेस्ट-रॉक्सी नफूसी