Mental Health in Modern Life: The Hidden Cost of MaterialismMental Health in Modern Life: The Hidden Cost of Materialism

Mental Health in Modern Life: The Hidden Cost of Materialism

भारतीय लोकजीवन में प्रसिद्ध कहावत को हम बचपन से सुनते आ रहे हैं, ‘‘मन चंगा तो कठौती में गंगा’’। इसका मतलब है कि यदि मन प्रसन्न हो तो अपने पास जो भी थोड़ा होता है, वही पर्याप्त होता है, पर आज की परिस्थितियों में हमारा मन चंगा नहीं हो पा रहा है और स्वास्थ्य तथा खुशहाली की जगह रोग-व्याधि के चलते लोगों का जीवन अस्त-व्यस्त होता जा रहा है।

आधुनिक जीवनशैली, उपभोक्तावाद और निरन्तर प्रतिस्पर्धा ने मनुष्य को भीतर से अशान्त कर दिया है। लोग निजी जीवन में भी असंतुष्ट रह रहे हैं।

आधुनिक समाज और मानसिक असंतोष

संस्था तथा समुदाय के लिए भी उनका योगदान कमतर होता जा रहा है। समाज के स्तर पर जीवन की गुणवत्ता घट रही है और हिंसा, भ्रष्टाचार, दुष्कर्म, अपराध और सामाजिक भेदभाव जैसी घटनाएँ बढ़ रही हैं। चिंता की बात यह है कि इन घटनाओं के प्रति संवेदनशीलता भी घट रही है। इस तरह के बदलाव का एक बड़ा कारण हमारी विश्व दृष्टि भी है।

हम एक नए ढंग का भौतिक आत्मबोध विकसित कर रहे हैं, जो सबकुछ तात्कालिक प्रत्यक्ष तक सीमित रखता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार मानसिक रोग आने वर्षों में वैश्विक स्वास्थ्य संकट का सबसे बडा कारण बन सकते हैं। चिन्ता की बात यह है कि यह समस्या केवल व्यक्तिगत जीवन स्तर तक सीमित नहीं है बल्कि परिवारिक, सामाजिक और संस्थागत ढांचे को भी प्रभावित कर रही है।

बदलती विश्व-दृष्टि

लोग अपने निजी जीवन से असन्तुष्ट हैं, रिश्तों में संवाद और संवेदनशीलता कम होती जा रही है। समाज के प्रति उत्तरदायित्व और सामूहिकता का भाव कमजोर पड़ रहा है। परिणामस्व रूप हिंसा, अपराध, भ्रष्टाचार और सामाजिक विभाजन जैसी समस्याएँ बढ़ रही है।

कभी हम सभी पूरी सृष्टि को ईश्वर के करीब पाते थे और सब के बीच निकटता देखते थे। आदमी सबके जीवन में अपना जीवन और अपने जीवन में सबका जीवन देखता था। वह जल, थल, वनस्पति, वायु, अग्नि और अंतरिक्ष सब की शांति की कामना करता था।

भौतिकता की दौड़

मनुष्य भी एक जीव था। इस नजरिये में सारा जीवन केंद्र में था, न कि सिर्फ मनुष्य। मनुष्य की मनुष्यता उसके अपने आत्मबोध के विस्तार में थी और वह सब की चिंता करता था। उसका धर्म अभ्युदय (भौतिक समृद्धि) और निःश्रेयस (आध्यात्मिक श्रेष्ठता या मोक्ष) दोनों को पाने की चेष्टा करता था। परंपरागत भारतीय दृष्टि में मनुष्य स्वयं को संपूर्ण सृष्टि का हिस्सा मानता था। जल, वायु, अग्नि, वनस्पति और अन्य जीवों के साथ उसका सह-अस्तित्व का भाव था।

परंतु आधुनिक चेतना ने एक ऐसा भौतिक आत्मबोध विकसित किया है, जिसमें जीवन को केवल भौतिक उपलब्धियों और तात्कालिक सुखों तक सीमित कर दिया गया है। आत्मा, नैतिकता और आध्यात्मिक मूल्यों को हाशिये पर डाल दिया गया है। इससे जीवन का संतुलन बिगड़ गया है।

धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष

आदमी सिर्फ धन-दौलत ही नहीं, बल्कि धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चारों लक्ष्यों की उपलब्धि के लिए सचेष्ट रहता था, लेकिन आधुनिक चेतना ने धर्म मुक्त समाज की कल्पना की और मनुष्य की बुद्धि को चेतना के भाव से मुक्त किया तथा सबको भौतिक सुख के साधन जुटाने में लगा दिया, जिसके नशे में सभी दौड़ रहे हैं, पर दौड़ पूरी नहीं हो रही है और अतृप्ति की वेदना से सभी आहत हैं।

भौतिक सुख क्षणिक होते हैं। अपेक्षाएँ पूरी नहीं होतीं, तो निराशा, तनाव और अवसाद जन्म लेते हैं। इस मिथ्या मरीचिका के असहनीय होने पर लोग आत्महत्या तक करने को उद्यत होने लगे हैं।

भारतीय दर्शन में जीवन के चार पुरुषार्थ-धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष-को संतुलित रूप से अपनाने की परंपरा रही है। धर्म जीवन को नैतिक दिशा देता है, अर्थ जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति करता है, काम जीवन में आनंद और सृजनशीलता लाता है, जबकि मोक्ष आत्मिक मुक्ति और शांति का मार्ग प्रशस्त करता है।

आधुनिक समाज ने इस संतुलन को तोड़ दिया है। धर्म और मोक्ष को अप्रासंगिक मानते हुए केवल अर्थ और काम को ही जीवन का लक्ष्य बना लिया गया है। परिणामस्वरूप मनुष्य भौतिक रूप से संपन्न होते हुए भी मानसिक रूप से दरिद्र होता जा रहा है।

‘मैं’ केंद्रित जीवन

जीवन का गणित अब विज्ञान के ईश्वर विहीन होते दौर में लड़खड़ाने लगा है। इसके दुष्परिणाम सामने हैं। अपने और पराय, मैं और तुम तथा हम और वे के बीच की खाई बढ़ती जा रही है। अपने ‘मैं’ को लेकर हम सब सचेष्ट हैं तथा उसकी सुरक्षा और सेवा-भाव में टहल के लिए समर्थित हैं। मैं से अलग जो अन्य या दूसरा है, वह हमारे लिए वस्तु हो गया है।

इस ‘मैं-केंद्रित’ सोच ने समाज में ‘हम’ की भावना को कमजोर कर दिया है। अपने-पराए, हम-वे, और मैं-तुम के बीच की खाई बढ़ती जा रही है। इससे सामाजिक तनाव, द्वेष और संघर्ष को बढ़ावा मिल रहा है, जो अंततः मानसिक अस्थिरता का कारण बनता है।

हम उपयोगिता के हिसाब से उसकी कीमत लगाते हैं और उससे होने वाले नफे-नुकसान के आधार पर व्यवहार करते हैं। अपने आत्म को संरक्षित और समृद्ध करने के लिए दूसरे के शोषण या हानि को स्वाभाविक ठहराते जा रहें हैं। सभी अपने-अपने ‘मैं’ अर्थात स्वार्थ की लिए कटिबद्ध हो रहे हैं।

ऐसे में शांति, आनन्द, सुख, मस्ती, प्रसन्नता, खुशी, उल्लास और आहलाद जैसे शब्द अब लोगों की आम बातचीत से बाहर हो रहे हैं। इस तरह के अनुभव जीवन से जहां दूर होते जा रहे हैं, वहीं उनकी जगह चिंता, उलझन, भय, तनाव, परेशानी, क्रोध, संत्रास, अवसाद, घुटन, कलह, द्वेष और द्वंद्व जैसी अनुभूतियाँ लेती जा रही हैं और जीवन भार सरीखा होता जा रहा है।

शरीर का बाज़ारीकरण

आज शरीर की उपभोग की वस्तु बनाकर उसे हमारी चेतना का खास हिस्सा बना दिया गया है। शारीर का रख-रखाव और प्रस्तुति आज एक जरूरी और पेचीदा काम हो गया है। नैसर्गिक सौन्दर्य के परे नख से शिख तक पूरे शरीर को संवारने-सजाने के उपकरण, उपचार और वस्त्रा भूषण की नित्य नवीन शैलियों की जानकारी का प्रचार-प्रसार इस तेजी से हो रहा है कि उसमें नवीनता को बनाए रखा एक जटिल चुनौती बनती जा रही है।

नख-शिख सजने-संवरने के लिए नए-नए उत्पाद, उपचार और ट्रेंड बाजार में आ रहे हैं। इससे लोगों में लगातार कमी और असंतोष की भावना बनी रहती है। यह मानसिक तनाव और आत्म-हीनता को जन्म देता है। इससे जुड़ा बाजार नित्य नई वस्तुओं को प्रस्तुत कर सबमें अभाव ग्रस्तता और कमी की अनुभूति को तीखा करने में जुटा हता है।

अनावश्यक आवश्यकताएँ

हमारी अतिरिक्त या अनावश्यक आवश्यकताओं की सूचीदिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। उनकी पूर्ति में श्रम, धन और समय का बड़ा जाया होता है। जिसके कारण जीवन के और कार्यों की उपेक्षा होती है या फिर उनमें व्यवधान आता है। इन उत्पादनों के प्रयोग से उपजने वाली स्वास्थ्य की समस्यांए दूसरी तरह के व्यतिक्रम पैदा करती रहती हैं।

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यही कारण है कि तीव्र सामाजिक बदलाव के दौर में आज मनो रोगियों की संख्या बड़ी तेजी से बढ़ रही है। कोविड महामारी के दौरान आर्थिक संकट और विस्थापन जैसी मुश्किलों ने मानसिक रोग की चुनौतियों को और बढ़ाया।

मानसिक स्वास्थ्य की समस्या की जड़ में सामाजिक तुलना भी एक प्रमुख कारक बन रहा है। दूसरों को देखकर हम अपने सुख-दुख और लाभ-हानि को समझने की कोशिश करते हैं। इसका दुष्परिणाम होता है कि हम अपने में न केवल लगातार कमी और हीनता की अनुभूति करते हैं बल्कि दूसरों के प्रति दुराव और वैमनस्य का भाव भी विकसित करने लगते हैं। हम भूल जाते हैं कि हर व्यक्ति सबसे अलग और खास होता है।

सोशल मीडिया

सोशल मीडिया के युग में सामाजिक तुलना मानसिक स्वास्थ्य की एक बड़ी चुनौती बन गई है। लोग दूसरों की उपलब्धियों, जीवनशैली और खुशहाल तस्वीरों को देखकर अपने जीवन को कमतर आंकने लगते हैं।

यह तुलना हीनभावना, ईर्ष्या और असंतोष को जन्म देती है। हम यह भूल जाते हैं कि हर व्यक्ति की परिस्थितियाँ, क्षमताएँ और जीवन-यात्रा अलग होती हैं। दूसरे की तरह होना और प्रतिस्पर्धा करने से अधिक उपयोगी है कि हम अपनी राह खुद बनाएं और अपनी अलग पहचान बनाएं। स्वास्थ्य के लिए मन, शरीर और आत्मा सबकी खुराक मिलनी चाहिए।

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शरीर का उपयोग न होना और श्रम हीनता आज इज्तत का पर्याय बन गया है, जिसके कारण मोटापा, मधुमेह और हदय रोग जैसी बीमारियां पनपने लगी हैं। इन सबके पीछे हमारे द्वारा आवश्यकता और लोभ के बीच अन्तर न कर पाना एक बड़ा कारण है। संयम और सन्तुष्टि का अभ्यास ही इसका एक मात्र समाधान है।

मन की चंचलता से विचलित होना तो स्वाभाविक है, परन्तु उसे साधकर अपने नियन्त्रण में लाना एक जरूरी चुनौती है, जिसे सचेत होकर स्वीकार करना पड़ेगा। इस दृष्टि से योग और ध्यान को जीवन में स्थान देना होगा। स्वच्छ वातावरण और स्वस्थ जीवन शैली मानसिक स्थिरता को बढ़ावा देती है। पर्याप्त नींद, संतुलित आहार, योग और ध्यान जैसी गतिविधियाँ मानसिक स्वास्थ्य को सुदृढ़ बनाती हैं।

निष्कर्षः संतुलित जीवन ही सच्चा सुख

आज आवश्यकता है कि हम अपने जीवन में सरलता, अनुशासन और सकारात्मक सोच को अपनाएँ। इससे न केवल व्यक्तिगत विकास होगा बल्कि समाज में भी समरसता और सहयोग की भावना विकसित होगी।

यही जीवन को सार्थक और संतुलित बनाने की कुंजी है। सरल जीवन हमें अनावश्यक बोझ से मुक्त करता है, अनुशासन जीवन को दिशा देता है और सकारात्मक सोच हमें चुनौतियों से लड़ने की शक्ति प्रदान करती है।

आधुनिक जीवन की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि साधनों की प्रचुरता के बावजूद सुख दुर्लभ होता जा रहा है। इसका समाधान बाहरी दुनिया में नहीं, बल्कि हमारे भीतर है। जब मन संतुष्ट होगा, तभी जीवन संतुलित और सार्थक बन पाएगा।

वास्तव में, मन चंगा तो कठौती में गंगा-यह कहावत आज भी उतनी ही प्रासंगिक है, जितनी पहले थी। हमें केवल इसे अपने जीवन में उतारने की आवश्यकता है।

सन्दर्भ-

  1. दैनिक जागरण
  2. Exploring the effects of a materialistic lifestyle on mental health

By admin

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