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How Much of Your Lifespan Is Genetic? New Study Suggests Up to 50% Heritability
आप कितने समय तक जीवित रहेंगे, यह आपके जीन (आनुवंशिकता) कितना तय करते हैं? यह प्रश्न लम्बे समय से वैज्ञानिकों, चिकित्सकों और आम लोगों को समान रूप से आकर्षित करता रहा है।
मनुष्य स्वाभाविक रूप से जानना चाहता है कि उसकी आयु का निर्धारण किन कारकों से होता है-क्या यह मुख्यतः उसके डीएनए में लिखा है, या फिर उसकी जीवनशैली, आहार, परिवेश और स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता अधिक निर्णायक भूमिका निभाते हैं?
दशकों तक इस विषय पर हुए शोध से यह सामान्य धारणा बनी रही कि मानव जीवनकाल में पाए जाने वाले अंतर का लगभग 20–25% हिस्सा आनुवंशिक कारकों से समझाया जा सकता है, जबकि शेष भाग पर्यावरण, जीवनशैली, सामाजिक परिस्थितियों और संयोग पर निर्भर करता है।
हालांकि, Science पत्रिका में प्रकाशित एक नए अध्ययन ने इस पारंपरिक दृष्टिकोण को चुनौती दी है। शोधकर्ताओं का तर्क है कि जीवनकाल की वंशानुगतता (heritability) के बारे में अब तक जो अनुमान लगाए गए थे, वे अधूरे थे, क्योंकि उन्होंने मृत्यु के कारणों में समय के साथ आए बदलावों को पर्याप्त रूप से ध्यान में नहीं रखा। यदि इन परिवर्तनों को सही ढंग से समायोजित किया जाए, तो जीवनकाल पर आनुवंशिक प्रभाव पहले की अपेक्षा कहीं अधिक-लगभग 50–55% -दिखाई देता है।
इस निष्कर्ष को समझने के लिए हमें “बाहरी” (extrinsic) और “आंतरिक” (intrinsic) मृत्यु के बीच का अंतर समझना होगा। लगभग एक सदी पहले, विशेषकर उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध और बीसवीं सदी की शुरुआत में, बड़ी संख्या में लोग बाहरी कारणों से मरते थे-जैसे संक्रामक रोग, दुर्घटनाएँ, हिंसा, प्रसव संबंधी जटिलताएँ या खराब स्वच्छता।
उस समय चिकित्सा विज्ञान आज जितना उन्नत नहीं था, टीकाकरण व्यापक नहीं था, एंटीबायोटिक दवाएँ उपलब्ध नहीं थीं, और औद्योगिक तथा सामाजिक सुरक्षा के मानक भी कमजोर थे। इन परिस्थितियों में किसी व्यक्ति की मृत्यु का कारण अक्सर उसके आनुवंशिक गुणों से कम और बाहरी जोखिमों से अधिक जुड़ा होता था।
इसके विपरीत, आज विकसित देशों में अधिकांश मृत्यु आंतरिक कारणों से होती है-यानी शरीर के क्रमिक क्षय (aging) और उम्र-संबंधी बीमारियों जैसे हृदय रोग, कैंसर, स्ट्रोक और डिमेंशिया के कारण। जब संक्रामक रोगों और दुर्घटनाओं से होने वाली मृत्यु कम हो जाती है, तो जो लोग वृद्धावस्था तक जीवित रहते हैं, उनकी आयु में अंतर अधिकतर उन कारकों से प्रभावित होता है जो शरीर के अंदर कार्य करते हैं और इनमें आनुवंशिक प्रवृत्तियाँ महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
नए अध्ययन में शोधकर्ताओं ने स्कैंडिनेविया के तीन बड़े जुड़वाँ समूहों के एक सदी से अधिक समय के आंकड़ों का विश्लेषण किया। जुड़वाँ अध्ययन आनुवंशिक प्रभावों को समझने का एक शक्तिशाली तरीका माने जाते हैं, क्योंकि समान ((monozygotic) जुड़वाँ लगभग एक जैसे जीन साझा करते हैं, जबकि असमान (dizygotic) जुड़वाँ लगभग सामान्य भाई-बहनों जितने आनुवंशिक रूप से समान होते हैं। यदि समान जुड़वाँ की आयु में समानता अधिक पाई जाती है, तो यह आनुवंशिक प्रभाव की ओर संकेत करता है।
शोधकर्ताओं ने विशेष रूप से उन मौतों को अलग कर दिया जो बाहरी कारणों-जैसे दुर्घटनाओं और संक्रमणों से हुई थीं। उन्होंने उन जुड़वाँ बच्चों का भी अध्ययन किया जो अलग-अलग वातावरण में पले-बढ़े थे, ताकि साझा परिवेश के प्रभाव को कम किया जा सके। साथ ही, अमेरिका में सौ वर्ष या उससे अधिक आयु तक जीवित रहने वाले व्यक्तियों (शतायु) के भाई-बहनों का भी विश्लेषण किया गया।
जब बाहरी कारणों से हुई मौतों को विश्लेषण से हटाया गया, तो जीवनकाल की वंशानुगतता का अनुमान नाटकीय रूप से बढ़ गया-20–25% से बढ़कर लगभग 50–55% तक। इसका अर्थ यह नहीं है कि हमारे जीन अचानक अधिक शक्तिशाली हो गए हैं, बल्कि यह दर्शाता है कि जैसे-जैसे बाहरी जोखिम कम हुए हैं, शेष अंतर में आनुवंशिक कारकों का अनुपात स्वाभाविक रूप से बढ़ गया है।
इस बिंदु को समझने के लिए मानव कद का उदाहरण अत्यंत उपयोगी है। एक सदी पहले किसी व्यक्ति की लंबाई काफी हद तक इस पर निर्भर करती थी कि उसे पर्याप्त पोषण मिला या नहीं, और क्या बचपन की बीमारियों ने उसकी वृद्धि को प्रभावित किया। आज, समृद्ध देशों में अधिकांश बच्चों को पर्याप्त पोषण और स्वास्थ्य देखभाल उपलब्ध है।
परिणामस्वरूप, कद में शेष अंतर अधिकतर आनुवंशिक भिन्नताओं से समझाया जाता है। इसका अर्थ यह नहीं है कि पोषण महत्वहीन हो गया है; बल्कि यह कि जब अधिकांश लोग अपनी पोषण-संबंधी जरूरतें पूरी कर लेते हैं, तो कद में बचा हुआ अंतर मुख्यतः जीन के कारण दिखाई देता है। फिर भी, यदि कोई बच्चा कुपोषित है, तो अच्छे जीन होने के बावजूद वह अपनी संभावित लंबाई तक नहीं पहुँच पाएगा।
यही सिद्धांत जीवनकाल पर भी लागू होता है। जब टीकाकरण व्यापक हो जाता है, स्वच्छता सुधरती है, प्रदूषण घटता है, और चिकित्सा सेवाएँ बेहतर होती हैं, तो पर्यावरणीय विविधता कम हो जाती है। गणितीय दृष्टि से, जब कुल विविधता में पर्यावरणीय योगदान घटता है, तो आनुवंशिक योगदान का प्रतिशत बढ़ता हुआ दिखाई देता है। वैज्ञानिक इसी अनुपात को “वंशानुगतता” कहते हैं।
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यहाँ एक महत्वपूर्ण तथ्य समझना आवश्यक है: वंशानुगतता कोई स्थिर, सार्वभौमिक जैविक गुण नहीं है। यह उस विशेष जनसंख्या और ऐतिहासिक संदर्भ पर निर्भर करती है जिसमें इसे मापा जा रहा है। 20–25% का पारंपरिक अनुमान उस समय की परिस्थितियों को दर्शाता था जब बाहरी खतरे अधिक थे। 50–55% का नया अनुमान उस संदर्भ को दर्शाता है जहाँ बाहरी खतरे अपेक्षाकृत कम हो चुके हैं। ये दोनों आंकड़े अपने-अपने संदर्भ में सही हो सकते हैं।
फिर भी, “जीवनकाल 50% वंशानुगत है” जैसे शीर्षक को गलत समझा जा सकता है। यह कथन यह नहीं कहता कि किसी व्यक्ति की आयु आधी जीन और आधी पर्यावरण से निर्धारित होती है। किसी विशेष व्यक्ति के लिए आनुवंशिक योगदान बहुत कम भी हो सकता है और बहुत अधिक भी-यह उसकी परिस्थितियों, जीवनशैली, सामाजिक-आर्थिक स्थिति और स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता पर निर्भर करता है।
लंबी आयु तक पहुँचने के अनेक मार्ग हो सकते हैं। कुछ लोग ऐसे जीन लेकर पैदा होते हैं जो उन्हें हृदय रोग या डिमेंशिया जैसी बीमारियों से प्राकृतिक सुरक्षा प्रदान करते हैं। अन्य लोग शायद इतनी अनुकूल आनुवंशिक संरचना न रखते हों, लेकिन वे संतुलित आहार, नियमित व्यायाम, धूम्रपान से परहेज, तनाव प्रबंधन और नियमित स्वास्थ्य जांच के माध्यम से अपनी आयु को बढ़ा सकते हैं। इस प्रकार, हर व्यक्ति जीन और पर्यावरण का एक अनूठा संयोजन है।
अध्ययन के लेखक स्वयं स्वीकार करते हैं कि जीवनकाल में अंतर का लगभग आधा हिस्सा अब भी पर्यावरण, जीवनशैली, स्वास्थ्य सेवाओं और आकस्मिक जैविक प्रक्रियाओं-जैसे कैंसर में कोशिकाओं का अनियंत्रित विभाजन-पर निर्भर करता है। इसलिए यह धारणा कि “सब कुछ जीन में लिखा है” वैज्ञानिक रूप से गलत है।
वास्तव में, जीन और पर्यावरण के बीच की परस्पर क्रिया (gene–environment interaction) अत्यंत जटिल है। कोई आनुवंशिक प्रवृत्ति तभी प्रभावी हो सकती है जब उसे व्यक्त होने के लिए उपयुक्त परिस्थितियाँ मिलें। उदाहरण के लिए, यदि किसी व्यक्ति में मधुमेह की आनुवंशिक प्रवृत्ति है, तो अस्वस्थ आहार और निष्क्रिय जीवनशैली उस जोखिम को बढ़ा सकती है, जबकि संतुलित जीवनशैली उस जोखिम को काफी हद तक कम कर सकती है।
भविष्य के शोध का एक प्रमुख लक्ष्य यह समझना है कि कौन-से विशिष्ट जीन या जीन-समूह दीर्घायु में योगदान करते हैं, और वे किस जैविक तंत्र के माध्यम से कार्य करते हैं। यदि इन तंत्रों को समझ लिया जाए, तो नई दवाओं, उपचारों और सार्वजनिक स्वास्थ्य नीतियों का विकास संभव हो सकता है, जो उम्र बढ़ने की प्रक्रिया को धीमा करें या उम्र-संबंधी बीमारियों को टाल सकें।
जैसे-जैसे विश्व के विभिन्न हिस्सों में बाहरी मृत्यु के कारण कम होते जा रहे हैं, यह देखना रोचक होगा कि जीवनकाल की वंशानुगतता के अनुमान कैसे बदलते हैं। विकासशील देशों में, जहाँ अभी भी संक्रामक रोग और दुर्घटनाएँ महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, वहाँ आनुवंशिक योगदान का प्रतिशत अलग हो सकता है।
अंततः, यह बहस हमें एक संतुलित निष्कर्ष तक ले जाती है: जीन और पर्यावरण दोनों ही महत्वपूर्ण हैं, और वे अलग-अलग नहीं बल्कि मिलकर कार्य करते हैं। हमारे जीन संभावनाएँ प्रदान करते हैं, लेकिन हमारा वातावरण और जीवनशैली यह निर्धारित करते हैं कि उन संभावनाओं में से कौन-सी वास्तविकता बनेगी।
इसलिए, यदि आप यह जानना चाहते हैं कि आपकी आयु कितनी होगी, तो इसका कोई सरल, एक-रेखीय उत्तर नहीं है। आपके जीन आपकी कहानी का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, लेकिन पूरी कहानी नहीं। आपकी आदतें, आपका परिवेश, आपकी सामाजिक परिस्थितियाँ और यहाँ तक कि संयोग भी उस कहानी को आकार देते हैं।
शायद यही इस शोध का सबसे महत्वपूर्ण संदेश है-हमारी आयु न तो पूरी तरह पूर्वनिर्धारित है और न ही पूरी तरह हमारे नियंत्रण में। यह जीन और पर्यावरण की एक सतत, जटिल साझेदारी का परिणाम है।
Reference-
2. https://www.sciencealert.com
3.https://www.sciencealert.com/cancer
4. https://www.livescience.com
5. Nexus:A Brief History of Information Networks from the Stone Age to AI by Yuval Noath Harari